क़तर के पंख अपने हौसलों की ,
कतरन जोड़े है जीवन के पन्नो के ,
स्वपन देखा ,एक रचना की
देखो यह तृष्णा कहाँ लेकर आ गई । ॥
शिशिर
Posted by rushshishir at 10:48 AM