घर

घरोँ को अपनी मन्ज़िल मिल गई,
बेबस इन्सानोँ को ठिकाना मिल गया,
जो खो गया था,दिनोँ के उजाले मेँ,
अन्धेरोँ ने उन्हे, घरोँ का रस्ता दिखा दिया /

कौन कहे, किस से कहे,
मय्खानोँ ने उन्हे जन्न्त के रास्ते दिखा दिये,
शराब का रंग,खून के रंग में इस तरह मिल गया
जैसे अस्थियोँ को संगम की धारा मिल गयी/

पग्डन्डियोँ पर चलना आसान हो गया
जब से कंकरीट के हाईवे को,
पार करने की कोशिश करने लगा/

ज़ोखिम उठा कर घर खड़ये हैं
पैरों पर अपने,देते हैं स्वपनों को सहारा,
पर ना जाने कब,घरों के पैरों की ज़मीन खिसक जाये/

घरों की त्रासदी हैं, खन्डहरों में
जो कुछ भी नहीं छिपाता,अपने बारे में,
लेकिन राज़ दफ़न किये रहता हैं
अपने बाशिंदो के //

समाप्त।